Thursday, September 22, 2011

कब तक, हम सब इसी तरह... एक दूजे को लूटेंगे...

कल 'एक' ने मुझको लूटा था...
आज मैंने "दूजा" लूट लिया 
कल "दूजे" की बारी होगी, 
और बली किसी और की होगी...
कब तक, हम सब इसी तरह...
एक दूजे को लूटेंगे...
रिश्वत के पैसे खायेंगे...
और बेईमानी से जियेंगे....
कब तक आखिर,
कब तक आखिर....

Thursday, September 15, 2011

क्या देकर जाने चाहेंगे हम आने वाली पीढ़ी को

क्या देकर जाने चाहेंगे हम आने वाली पीढ़ी को
हर इंसान मैं सिमटी एक दुनिया, मेरी दुनिया तेरी दुनिया...
सब की अपनी अपनी दुनिया...
सब के अपने अपने से सच,
सच है तो फिर सिर्फ यही, जिस मैं मेरा ही फायदा हो
बस मेरा पेट भरा हो फिर, जग सारा चाहे भूखा हो
रिश्वत के इस जाल फंसी, निरीह सी  युवती सी दुनिया
जिस्मो को बेच , खरीद रही, संवेद हीन सी ये दुनिया .. 
शहीदों के कफ़न को बेच रही, सरकारों की ये दुनिया...
झूठ बोलना समझा कर,  बच्चों को झूठ सिखाती दुनिया
हर बार मैं मेरा तेरा है, कह कह कर लडती ये दुनिया
मैं हिन्दू हूँ, तू मुस्लिम है...राम हूँ मैं , रहीम हैं तूं
इस झूठे सच्चे, तिलिस्म मैं , मरती और लडती ये दुनिया....
कब समझेंगे हम सब मिलकर, तेरा मेरा न हमारा है...
क्या देखेंगे आती पुश्तें, बुजुर्गों ने सिर्फ बिगाड़ा है...
सब अपना पाना फर्ज समझो, जो गलत है उस के खिलाफ उठो...
रिश्वत मांगे तो मना करो ,  और लटकाए तो कारण पूछो...
अपने हक़ को तुम जान लो आज, और अपने फ़र्ज़ भी तुम समझो...
जब समझ तुम ये जाओगे, बदल जाएगी ये दुनिया...
बच्चे पोते तो होंगे तब, कह पाओगे फखर से तुम...
बहुत बुरी थी जब हम थे, और बहुत बुरी थे ये दुनिया...
हम लड़े भिड़े इस दुनिया से , तब ही बदली है ये दुनिया  

एक सपना है जो मेरा है, तू भी अपना और समझ ले ये...
अगर करना है तो करना है...
अगर आज ये न हम कर पायेंगे...
तो फिर , आने वाली पीढ़ी को...
शकल कौन सी दिखायेंगे...
नाकारा और , बुजदिल लोगों को टोली हम सब कहलायेंगे...
एक बुज़ुर्ग, और मरता हुआ मुल्क दे कर हम जायेंगे...
आओ मिल कर आगे हम बदें, गिराएँ न तरक्की की सीढ़ी को...
और फिर खुद से ही सवाल करें....
क्या देकर जाना चाहेंगे, हम आने वाली पीढ़ी को....


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