Tuesday, January 19, 2016

रोहित - सवाल सरकारी सोच के विरोध के उत्पीडन का है - हम उसे जाति में क्यों बाँट रहे है

रोहित एक विद्यार्थी था एक गरीब घर का विद्यार्थी जो अपनी योग्यता के बल पर इस जगह तक पहुंचा
वो जिस संस्था के साथ था, उस संस्था ने 'मुज्ज़फर नगर बाकी  है " की स्क्रीनिंग का समर्थ किया,
जिसे भाजपा समर्थित, ABVP ने विरोध किया
रोहित और उसकी संस्था ने  याकूब मेनन की फांसी का विरोध किया
शांतिपूर्ण विरोध करना हर इंसान का अधिकार है
और एक केन्द्रीय मंत्री इस विरोध को देश विरोधी करार देता है
सरकारी हस्तक्षेप इस हद तक बढ़ जाता है , कि रोहित और उसके साथियों को होस्टल एवं मेस से निकल दिया जाता है
तीन महीने के बाद, रोहित हरा दिया जाता है
और वो अपनी जिंदगी ख़तम कर लेता है
और अब, हमारे नेता इस बात को दलित और सवर्ण में बाँट देना चाहते है
सवाल होना चाहिए, कि क्या किसी को अपनी बात शांतिपूर्ण रखने का हक़ नहीं है
अगर कोई, सरकारी विचारधारा का विरोध रखे तो क्या वो देशद्रोही हो जायेगा
बड़ा सवाल यही है ,
रोहित का उत्पीडन, उसकी सोच की हत्या है और इसका उसकी जाति से कोई लेना देना नही है

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