Sunday, January 5, 2014

सब्सिडी का खेल - कौन है वास्तविक लाभ लेने वाले

सब्सिडी एक सामाजिक वास्तविकता है.. और ये सभी देशों में पाई जाती है..
इसके रूप एवं लाभ लेने वाले अलग हो सकते है...अमेरिका जैसे देश में भी किसानों को और गरीबों को सब्सिडी दी जाती है...

भारत एक कल्याणकारी देश है, और मूलभूत आवश्यकतायों की पूर्ति हर नागरिक का अधिकार है..
सभी नागरिक किसी भी समाज में काम नहीं करते, बहुत से लोग बच्चे, बूढ़े, आश्रित और कम कमाई वाले हो सकते है.. तो समाज का और सरकार का फ़र्ज़ है, कि वो इन का भी ध्यान रखे
अब सब्सिडी के मूल विषय पर आते है, सरकार का फ़र्ज़ है, की वो उन लोगों को कम कीमत पर सुविधा प्रदान करें जो उसका वास्तविक मूल्य नहीं दे सकते , और इस की भरपाई अपने साधनों से, और उन लोगों से योगदान से करें जो आर्थिक तौर  पर ज्यादा समृद्ध हो. इस का एक उदहारण इनकम टैक्स की अलग अलग स्लैब से हो सकता है, जिसकी कमाई जितनी ज्यादा हो , उस पर टैक्स भी उतना ही ज्यादा हो.
इस के इलावा सामान्य ज़रुरत की चीज़ें सस्ती हो, और भोग विलास की चीज़ पर ज्यादा टैक्स हो.. इस का उदाहरण सस्ता रसोई गैस का सिलिंडर और बहुत बड़ी कार महंगी हो सकती हैं.

भारत में सब्सिडी के नाम पर राजनीति ज्यादा और वास्तविक ज़रूरतमंदों को लाभ कम होता है..
कागजों में सब्सिडी बहुत दिखती है, लेकिन असल ज़रूरतमंद के पास या तो मिलती ही नहीं या फिर बहुत कम मिलती है... सार्वजनिक वितरण प्रणाली , द्वारा राशन कार्ड से मिलने वाले सामान मैं होने वाले घोटाले इस का सब से साधारण उदाहरण हैं.
सरकार हजारों करोड़ रुपये  कई किसानों का ऋण माफ़ किया गया.. और इस के सब से बड़े लाभार्थी हो लोग थे, जिन के बड़े बड़े खेत थे, और जिन लोगों ने जान बूझ कर ऋण वापिस नहीं दिया..
जो गरीबों के लिए बी पी एल कार्ड बनते है, वो असली गरीबों के न बन कर उन लोगों के बन जाते हैं, जिन्हें इनकी ज़रुरत ही नहीं होती...
अभी कुछ वक्त पहले ही भारत सरकार ने खाद्य सुरक्षा बिल पास किया है.. भगवन जानता है, ये अनाज कैसे ज़रूरतमंद तक पहुंचेंगे
इस सब से सरकार की जेब से पैसे तो निकल जाते है, लेकिन उसे नहीं मिलते जिसे इसकी ज़रुरत हो...
एक और बड़ी बात सरकारें सब्सिडी तो देती है, लेकिन ऐसी व्यवस्था को नहीं सुधारती जिसे से एक तो एक तो ज़रूरतमंद को सब्सिडी मिले, दूसरा लोगों को इस लायक बनाने की दिशा में काम करें जो आगे से सब्सिडी कम हो..

राजनीतिक दल अलग अलग उद्योगपतियों से चंदा लेते है..राजनैतिक दल हजारों करोड़ के अघोषित चंदे लेते हैं, और अपने फायदे का कानून बना कर इसे घोषित करने से बचते है,  और बदले में सरकार बन जाने के बाद उनके फायदा पहुंचाते हैं.. अब इस में मज़े की बात ये है, कि सरकार जब आम लोगों को दे तो उसे सब्सिडी कहा जाता है, और जब सरकार इन उद्योगपतियों को पैसे देती है, तो कहा जाता है कि सरकार उद्योगों को प्रोत्साहन (incentive) दे रही है ..वो भी उस स्थिति में,  की जब रोज़गार उस अनुपात से नहीं बढ़ रहे..

एक तरफ सरकार कहती है, कि उनके पास पैसे नहीं है, और वो इन उद्योगपतियों के हजारों करोड़ रूपये माफ़ कर देती है..
पिछले १० साल में उद्योगपतियों को पचास लाख करोड़ रुपये का प्रोत्साहन दिया गया है.. और इस के अनुपात में ना तो उतने रोज़गार बढ़ते है, ना ही महंगाई घटती है..

प्रभु चावला 20:50 मिनट पर
भाजपा और कोंग्रेस दोनों के प्रतिनिधि मौजूद हैं लेकिन कोई भी इस बात का खंडन नहीं करता
http://khabar.ibnlive.in.com/videos/114247

विडियो में 5:30 मिनट के बाद सुने.
महाराष्ट्र सरकार उद्योग प्रोत्साहन के लिए पचीस सौ करोड़ देती है, और छह सो तीस करोड़ रूपये पावर लूम के लिए दे देती है
कोंग्रेस के प्रवक्ता कुछ नहीं बोलते है
http://www.timesnow.tv/Debate-Aping-AAP---4/videoshow/4445016.cms

कर्नाटका में भाजपा का मैनिफेस्टो कहता है कि ये लोग जीतने के बाद डेढ़ करोड़ लैपटॉप और पचीस किलो चावल एक रुपये पार्टी किलो के हिसाब से देंगे , और इस के लिए छह हजार करोड़ का खर्चा होगा..
विडियो में 10:00 मिनट के बाद देखें

http://www.timesnow.tv/Debate-Aping-AAP---3/videoshow/4445015.cms

इसी क्रम में दिल्ली सरकार ने कहा है कि  एक निश्चित सीमा तक प्रयोग करने के लिए पानी मुफ्त हो जाएगा..इस मुफ्त पानी के पैसे पूरा करने के लिए ज्यादा प्रयोग करने वाले से ज्यादा बिल लिए जायेंगे.. इस के साथ बिजली के बिल पर भी वो भी तीन महीने के लिए सब्सिडी देंगे और बिजली के बिल कम हो जायेंगे.. ,  इस मैं ध्यान रखें वाली बात ये भी है, कि बिजली के बिल बाद में बढ़  भी सकते है, क्योंकि ये सब्सिडी केवल CAG Audit होने तक है..

अब इस सब को आप  रिश्वत कहें, लिए गए चंदे के लिए फायदा पहुँचाना कहे, जनता के साथ धोखा कहें, या फिर एक अच्छी व्यवस्था कहेंगे, फैसला आप स्वयं कर सकते हैं....

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