Wednesday, June 4, 2014

क्या कुछ भी कहना अपराध है...

मैं एक हिन्दू हूं , और मुझे इस के लिए गर्व होना चाहिए...
लेकिन क्या यही गर्व मुझे किसी और की ज़िन्दगी लेने का अधिकार देता हैं...
सभी को अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अधिकार है...
अगर आपको उनकी बात अच्छी नहीं लगती.. आप अपनी भावनाएं व्यक्त करें..
शब्द संयमित और उत्तेजक नहीं होने चाहिए..
महाराष्ट्र में.. एक नवयुवक को पीट पीट कर मार डाला गया...
उसका अपराध : एक सोशल साईट पर , कथित तौर पर शिवाजी महाराज एवं बाला साहब ठाकरे की आपत्तिजनक तस्वीरे /कमेन्ट
मैंने तस्वीरें नहीं देखीं , तो मैं इस स्थिति में नहीं हूँ.. कि कह सकूं की तस्वीरें आपत्तिजनक थी या नहीं..
क्या ऐसे कोई साधन नहीं है, जो देख सके कि जो उसने किया वो वास्तव में अपराध था भी या नहीं...
कानून का राग अलापने वाले कहाँ है?
कुछ दिन पहले सोशल साइट्स पर ही, शिवाजी महाराज की तस्वीर पर हमारे प्रधानमंत्री जी की तस्वीर चस्पा कर दी गई थी...
क्या ये तस्वीर आपत्तिजनक नहीं थी ?
हमें अपने आप से पूछना पड़ेगा...
क्या समाज में ऐसा व्यवहार स्वीकार्य हैं?
क्या हम इतने असहिष्णु हो गए हैं...
क्या किसी को सिर्फ अपना मत व्यक्त कर देने के लिए जान से मार देना चाहिए..
ये अच्छी परम्परा नहीं है..

निष्पक्ष पक्षधर

इसे भारत  का दुर्भाग्य ही कहेंगे...
हमारे अधिकांश पत्रकार एवं निष्पक्षता के साथ पक्षधर हो गए मालूम होते हैं...
किसी भी घटना को निष्पक्षता से देखने का समय मानो अब चुक गया है...
किसी एक पार्टी के किये सारे काम अधर्म और नाटक लगने लगते हैं, और दूसरी पार्टी मानो  स्वर्ग से अवतरित हो और उनके सब के सब काम धर्म बताये जाते हैं..

जब एक घटना किसी एक पार्टी से सम्बन्धित होती है...
तो सब के सब आक्रामक नज़र आते है...
लगने लगता हैं, मानो सब के सब कानून के जानकार इन टीवी स्टूडियो में डेरा डाल बैठे होते हैं.
बार बार लगातार , लोगों को दिखाया जाता है
नैतिकता के पाठ पढाये जाते हैं...
समझाया जाता है, कि कैसे क़ानून का उल्लंघन हो रहा है..
कैसे एक पार्टी विशेष, और एक व्यक्ति विशेष अपने आप को कानून से ऊपर समझता है...
उस पर तुर्रा ये, कि हमारा गृह विभाग एवं पुलिस भी अति सक्रिय हो जाती है...
किसी भी तरह के विरोध को रोकने के लिए धारा एक सो चवालीस लगा दी जाती है...
हमारा समाज और पत्रकार मित्र इस तरह घटना को देखते हैं, मानो भारत में आदर्श स्थिति है

कुछ दिन बीतते हैं
घटना वही रहती है, लेकिन पात्र बदल जाते हैं...
लेकिन रहस्यमयी ढंग से सब तरफ एक चुप्पी छा जाती है..
आक्रामकता सहनशीलता में बदल जाती है..
क़ानून के जानकार मानो कहीं दूर छुट्टी पर चले जाते हैं...
बुद्धू बक्सा नए पत्रों को मानो देख ही नहीं पाता है..
नैतिकता , अब व्यवहारिकता का स्थान ले लेती है...
गृह विभाग और पुलिस भी मानो अब विरोध को अच्छा मान लेने लगती है..
अब के बार समाज इसे व्यवहारिकता मान लेता है...

एक ही तरह की घटना के लिए तो तरह की प्रतिक्रिया होती है...
क्या इतना सब देखने के बाद भी ये कहना चाहिए कि जो सब हम देखते है, वो वास्तव में निष्पक्ष सत्य है...
मुझे तो ऐसे नहीं लगता, आप को क्या लगता है अपने विचार ज़रूर कहें..
अच्छा होगा, अपनी भाषा संयमित रखें...

Sunday, May 11, 2014

बनारस: राजनैतिक सत्य- भाजपा के पुराने काम और नए सपने

बनारस, वाराणसी या फिर काशी...
नाम अनेक हैं.. शहर एक है...
आजकल बहुत चर्चा में हैं...
चुनाव होने को हैं...
और शहर नेताओं के नाम पर बंट चुका हैं..
वही लोग जो ऊपर से गंगा जमनी तहज़ीब की दुहाई देते हैं...
अंदरखाते वही लोग इसे तोड़ने की , और वोटों के ध्रुवीकर्ण के लिए काम करते हैं..
खैर ये तो सभी पार्टिओं की बात हुई...
पिछले पन्द्रह साल से बनारस नगर निगम पर  भाजपा काबिज़ है..
पिछले दस साल से मुरली मनोहर जोशी सांसद हैं....
अगर भाजपा इतनी विकाशील है, तो भाई अब तक तो काशी स्वर्ग बन जाना चाहिए...
सच्चाई इस के एकदम विपरीत है
काशी उत्तर प्रदेश के अन्य स्थानों से बिलकुल अलग नहीं है.
गंगा की सफाई आज भी बड़ा मुद्दा है...
सीवरेज व्यवस्था बदहाल है..
शहर का विकास का मुद्दा ठन्डे बसते में हैं..
सड़कों का बुरा हाल है...
जो भाजपा इतने वर्षों में कुछ नहीं कर सकी..
अब वो गुजरात के विकास का मॉडल बेच रहे हैं..
कह रहे हैं की नरेंद्र मोदी को चुन कर प्रधानमंत्री बनाये
और वाराणसी स्वर्ग बन जायेगा...
इस सवाल का जवाब कहाँ पर है,
की आप लोग पन्द्रह साल से सत्ता में हैं,
अब तक आप लोगों ने क्या किया...
हैरानी इस बात की है,
की जो मीडिया दिल्ली सरकार के 49 दिन के कामों का पोस्ट-मोर्टम कर रहे थें
भाजपाई 15 सालों के कार्यकाल पर चुप हैं...
अभी ये भी देखने की बात हैं, क्या ज़मीनी स्तर लोग क्या सोचते हैं.
क्या जो मीडिया दिखा रहा है, लोग भी यही सोच रहे हैं..
या फिर वास्तविकता इस से अलग है....
जो भी जीते, वो काशी के लिए काम करे..
सभी प्रत्यशियो को शुभ कामनाएँ 

Friday, April 25, 2014

बाबा जी बस करो....

बाबा रामदेव जी ने नया धमाका कर दिया है...
बाबा जी फरमाते हैं...राहुल गाँधी, दलितों के घर हनीमून मनाने जाते हैं...
ये हमारे स्वयंभू चरित्र गुरू है..
सारे भारत के चरित्र के ठेकेदार है....
हम भूल गए भाई.. ये तो सन्यासी भी है...
ऐसे सन्यासी जिनको मोह माया नहीं हैं...
लेकिन करोड़ों रूपये की संपत्ति है...
धन्य हो बाबा जी...
कम से कम उस स्त्री के बारे में तो सोचते,
जिस बेचारी के घर कुछ वक्त राहुल गाँधी ने वक्त बिताया था....
आपको उस का चरित्र हनन करने का अधिकार किस ने दिया है...


ये विडियो सिर्फ बाबा रामदेव के शब्दों के लिए शेयर किया गया है..

Tuesday, January 7, 2014

हमारे नेता - इनके स्टडी टूर, और उसका फायदा

कर्नाटक में सभी पार्टिओं के विधायकों एकजुटता दिखाई है.. और ये एकजुटता आगे भी दिखाई देने की पूरी उम्मीद है..काँग्रेस, भाजपा और जनता दल सब के विधायक , बिना किसी भेद भाव के इकटठे गए है...
हमारे तेरह विधायक आस्ट्रेलिया और न्यू जी लैंड का "शैक्षिक" दौरा कर के आये है... 
इस दौरान ये विचार किया गया, कि  कैबरे में डांस कैसे करते हैं.. समंदर किनारे पर कैसे घूमा जाता है.. शराब कितने तरह की होती है.. 
बहुत खूब..
मुख्यमंत्री जी कहते है, कि  विधायकों के स्टडी टूर पर उनका कंट्रोल नहीं है.
उस पर तुर्रा ये, कि  अगला ग्रुप जाने को तैयार है....
कुछ सवाल....

१. इस खर्चे की वसूली कैसे होगी? वैसे इस मैं मुझे संदेह है, विधायकों के पास अब पैसे होंगे नहीं, हजारो करोड़ के ऐसा चंदा रखने  वाली पार्टियाँ, जिस पैसे का हिसाब ही नहीं, वो  भी नहीं देंगी. लगता है, जनता ही देगी.... :) २. आज तक, ऐसे शैक्षिक दौरों से क्या फायदा हुआ, क्या कोई पार्टी इसका भी CAG ऑडिट करवाएगी....
३. क्या आगे से ऐसे दौरों  पर रोक लगेगी... 

Sunday, January 5, 2014

सब्सिडी का खेल - कौन है वास्तविक लाभ लेने वाले

सब्सिडी एक सामाजिक वास्तविकता है.. और ये सभी देशों में पाई जाती है..
इसके रूप एवं लाभ लेने वाले अलग हो सकते है...अमेरिका जैसे देश में भी किसानों को और गरीबों को सब्सिडी दी जाती है...

भारत एक कल्याणकारी देश है, और मूलभूत आवश्यकतायों की पूर्ति हर नागरिक का अधिकार है..
सभी नागरिक किसी भी समाज में काम नहीं करते, बहुत से लोग बच्चे, बूढ़े, आश्रित और कम कमाई वाले हो सकते है.. तो समाज का और सरकार का फ़र्ज़ है, कि वो इन का भी ध्यान रखे
अब सब्सिडी के मूल विषय पर आते है, सरकार का फ़र्ज़ है, की वो उन लोगों को कम कीमत पर सुविधा प्रदान करें जो उसका वास्तविक मूल्य नहीं दे सकते , और इस की भरपाई अपने साधनों से, और उन लोगों से योगदान से करें जो आर्थिक तौर  पर ज्यादा समृद्ध हो. इस का एक उदहारण इनकम टैक्स की अलग अलग स्लैब से हो सकता है, जिसकी कमाई जितनी ज्यादा हो , उस पर टैक्स भी उतना ही ज्यादा हो.
इस के इलावा सामान्य ज़रुरत की चीज़ें सस्ती हो, और भोग विलास की चीज़ पर ज्यादा टैक्स हो.. इस का उदाहरण सस्ता रसोई गैस का सिलिंडर और बहुत बड़ी कार महंगी हो सकती हैं.

भारत में सब्सिडी के नाम पर राजनीति ज्यादा और वास्तविक ज़रूरतमंदों को लाभ कम होता है..
कागजों में सब्सिडी बहुत दिखती है, लेकिन असल ज़रूरतमंद के पास या तो मिलती ही नहीं या फिर बहुत कम मिलती है... सार्वजनिक वितरण प्रणाली , द्वारा राशन कार्ड से मिलने वाले सामान मैं होने वाले घोटाले इस का सब से साधारण उदाहरण हैं.
सरकार हजारों करोड़ रुपये  कई किसानों का ऋण माफ़ किया गया.. और इस के सब से बड़े लाभार्थी हो लोग थे, जिन के बड़े बड़े खेत थे, और जिन लोगों ने जान बूझ कर ऋण वापिस नहीं दिया..
जो गरीबों के लिए बी पी एल कार्ड बनते है, वो असली गरीबों के न बन कर उन लोगों के बन जाते हैं, जिन्हें इनकी ज़रुरत ही नहीं होती...
अभी कुछ वक्त पहले ही भारत सरकार ने खाद्य सुरक्षा बिल पास किया है.. भगवन जानता है, ये अनाज कैसे ज़रूरतमंद तक पहुंचेंगे
इस सब से सरकार की जेब से पैसे तो निकल जाते है, लेकिन उसे नहीं मिलते जिसे इसकी ज़रुरत हो...
एक और बड़ी बात सरकारें सब्सिडी तो देती है, लेकिन ऐसी व्यवस्था को नहीं सुधारती जिसे से एक तो एक तो ज़रूरतमंद को सब्सिडी मिले, दूसरा लोगों को इस लायक बनाने की दिशा में काम करें जो आगे से सब्सिडी कम हो..

राजनीतिक दल अलग अलग उद्योगपतियों से चंदा लेते है..राजनैतिक दल हजारों करोड़ के अघोषित चंदे लेते हैं, और अपने फायदे का कानून बना कर इसे घोषित करने से बचते है,  और बदले में सरकार बन जाने के बाद उनके फायदा पहुंचाते हैं.. अब इस में मज़े की बात ये है, कि सरकार जब आम लोगों को दे तो उसे सब्सिडी कहा जाता है, और जब सरकार इन उद्योगपतियों को पैसे देती है, तो कहा जाता है कि सरकार उद्योगों को प्रोत्साहन (incentive) दे रही है ..वो भी उस स्थिति में,  की जब रोज़गार उस अनुपात से नहीं बढ़ रहे..

एक तरफ सरकार कहती है, कि उनके पास पैसे नहीं है, और वो इन उद्योगपतियों के हजारों करोड़ रूपये माफ़ कर देती है..
पिछले १० साल में उद्योगपतियों को पचास लाख करोड़ रुपये का प्रोत्साहन दिया गया है.. और इस के अनुपात में ना तो उतने रोज़गार बढ़ते है, ना ही महंगाई घटती है..

प्रभु चावला 20:50 मिनट पर
भाजपा और कोंग्रेस दोनों के प्रतिनिधि मौजूद हैं लेकिन कोई भी इस बात का खंडन नहीं करता
http://khabar.ibnlive.in.com/videos/114247

विडियो में 5:30 मिनट के बाद सुने.
महाराष्ट्र सरकार उद्योग प्रोत्साहन के लिए पचीस सौ करोड़ देती है, और छह सो तीस करोड़ रूपये पावर लूम के लिए दे देती है
कोंग्रेस के प्रवक्ता कुछ नहीं बोलते है
http://www.timesnow.tv/Debate-Aping-AAP---4/videoshow/4445016.cms

कर्नाटका में भाजपा का मैनिफेस्टो कहता है कि ये लोग जीतने के बाद डेढ़ करोड़ लैपटॉप और पचीस किलो चावल एक रुपये पार्टी किलो के हिसाब से देंगे , और इस के लिए छह हजार करोड़ का खर्चा होगा..
विडियो में 10:00 मिनट के बाद देखें

http://www.timesnow.tv/Debate-Aping-AAP---3/videoshow/4445015.cms

इसी क्रम में दिल्ली सरकार ने कहा है कि  एक निश्चित सीमा तक प्रयोग करने के लिए पानी मुफ्त हो जाएगा..इस मुफ्त पानी के पैसे पूरा करने के लिए ज्यादा प्रयोग करने वाले से ज्यादा बिल लिए जायेंगे.. इस के साथ बिजली के बिल पर भी वो भी तीन महीने के लिए सब्सिडी देंगे और बिजली के बिल कम हो जायेंगे.. ,  इस मैं ध्यान रखें वाली बात ये भी है, कि बिजली के बिल बाद में बढ़  भी सकते है, क्योंकि ये सब्सिडी केवल CAG Audit होने तक है..

अब इस सब को आप  रिश्वत कहें, लिए गए चंदे के लिए फायदा पहुँचाना कहे, जनता के साथ धोखा कहें, या फिर एक अच्छी व्यवस्था कहेंगे, फैसला आप स्वयं कर सकते हैं....

Saturday, January 4, 2014

भारत से लोगों का पलायन - आखिर क्यों...

इतिहास लोगों के पलायन और उसके बाद उनके संघर्ष की कहानी है ..
पलायन एक बहुत बड़ी वास्तविकता है, और ये हर समय, समाज और देश में  होता रहा है..
चाहे वो भारत में , मध्य पूर्व से आने वाले आर्य हों... या फिर सारी दुनिया से अमेरिका को जाने वाले लोग हो... न्यू यॉर्क मैं स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी तो पलायन कर के आने वाले लोगों के लिए प्रवेश द्वार बन गया.. 
चाहे पूर्वी यूरोप से इंग्लॅण्ड आने वाले लोग हो.. ये सब पलायन के ही अलग अलग रूप है....

भारत में भी यह एक सत्य है...
सवाल ये है, की पलायन क्यों होता है...
एतिहासिक तौर  पर पलायन का प्रमुख कारण आर्थिक रहा है.. जब लोग अपने पैत्रिक स्थान पर आर्थिक समृधि  के लिए ज्यादा साधन नहीं देखते, तो उस तरफ जाने की कोशिश करते हैं, जहाँ पर वो साधन हो...
गाँवों से शहरों की और पलायन, इसका एक उदाहरण है...
अब सवाल है, भारत से विदेशों को पलायन ..
तो इस पलायन को मैं श्रेणियों में बांटना चाहूँगा.. 
पहला पलायन पढ़े लिखे लोग है, जिस मैं डॉक्टर, इंजिनियर, और वैज्ञानिक है... 
दूसरी श्रेणी में वो लोग है, जो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं है, और मजदूर वर्ग का प्रधिनित्व करते हैं..
दोनों श्रेणियो के पलायन के कारण अलग है...

दूसरी श्रेणी के लिए पलायन का कारण मूलतः आर्थिक हैं, उन्हें लगता है कि जिस काम के लिए भारत में कम तनख्वाह मिलती है , और उस तनख्वाह में वो आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं हो सकते, उसी काम के लिए उन्हें अच्छा मेहनताना मिल सकता है परदेस में, और वो अधिक खुश रह सकते हैं....

पहली श्रेणी के लोगों का कारण मुख्यतः आर्थिक कम होता है.., ये लोग ज़्यादातर अच्छी पगार लेने वाले लोग होते है, इन लोगों का समाज में अच्छा रूतबा होता है, मध्यम या फिर उच्च मध्यम वर्ग से सम्बन्ध रखते है..ये लोग ज़्यादातर रोज़ मर्रा की चीज़ों को खरीद सकने का माद्दा रखते है.. तो फिर ये लोग क्यों देश को छोड़ कर परदेस का रुख क्यों  करते है... मेरे हिसाब से इस का बहुत बड़ा कारण सामजिक व्यवस्था है... जब मैं छोटा था , तो कभी कभी सुना करता था, फलाना आदमी बहुत पढ़ लिख गया था, तो उसका दिमाग खराब हो गया.. मुझे उस समय ये बात समझ नहीं आती थी, अब शायद थोड़ी सी समझ आई , की असल में वो ये समझ नहीं पा रहे थे, कि क्यों समाज में इतनी अव्यवस्था है, और चीज़ें इतनी गड्ड मड्ड क्यों है...और चीज़ें व्यवस्थित क्यों नहीं है..और जब वो इसके खिलाफ से एक आदर्श व्यवस्था की उम्मीद करता है, तो गड़बड़ होती है 
 जब इस श्रेणी के लोग समाज को अपना योगदान देना चाहते हो, ईमानदारी से जीना चाहते हो, और ढंग से जीना चाहते हो... हमारा समाज इस तरह जीने नहीं देता... सरकारी नीतियों, और नैतिक अवमूल्यन की वजह से सामाजिक जीवन स्तर पतन की तरफ बढ़ रहा है.. इस वजह से जो निकल सकते हो, वो पलायन कर जाते है.. हालाँकि सभी पलायन नहीं करते, बहुत से लोग उसी समाज में रह कर उसे सुधारने की कोशिश भी करते हैं.. 
कोई भी वो गलियां, गाँव और दोस्त नहीं छोड़ना  चाहता , जो उसके शरीर और आत्मा तक में बसे होता है... लेकिन सामाजिक अव्यवस्था इस इच्छा पर भारी हो जाती है, और इंसान भरे मन से पलायन कर जाते हैं 

भारत - क्या राजनीति बदल रही है ?

पिछले कुछ समय से भारतीय राजनीति में बदलाव की बयार बह रही लगती है...
अगर हम इतिहास में  वापिस जाएँ.. तो स्वतंत्रता पूर्व एवं पश्चात् काँग्रेस राजनीति का पर्याय बन चुकी थी..
जो राजनीति सेवा के लिए जानी जाती थी, भ्रष्टाचार उस में रचने बसने लगा...
आज की भाजपा, जन संघ से शुरू  हुई... बहुत देर तक भाजपा काँग्रेस का विकल्प लगता था...
पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली में सरकार बनायी , १ वर्ष में ही सरकार सिर्फ १ वोट की वजह से गिर गई...भाजपा ने अन्य दलों के साथ मिल कर सरकार बनाई, और अगले पांच वर्षों तक सरकार चलाई...
इस के पश्चात कई बातों से लगा मानो भाजपा का कांग्रेसीकरण हो गया हो..
कर्नाटक में जो हुआ, और रेड्डी बंधुओं को मिला अभयदान शायद उसी पर मुहर लगाते है...
इस से पहले जो वाजपेयी सरकार सिर्फ एक वोट की वजह से गिर गई थी, उसी के नेताओं के सुर बदल गए...
इस मैं सिर्फ भाजपा को दोष देना भी गलत होगा... अगर हम सपा (समाजवादी पार्टी ), बसपा (बहुजन समाज पार्टी ), अकाली दल, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और अन्य दलों को देखें ... तो सभी एक जैसे दिखाई देते हैं..

अगर किसी पर भी  भ्रष्टाचार का आरोप लगे, तो वो कहने लगे की भाई आप ने भी तो वहां भ्रष्टाचार किया था.. और इस में कोई नेता पीछे नहीं रहा...

सभी राजनैतिक दलों में अच्छे नेता आज भी हैं, लेकिन अधिकतर वो हाशिये पर जा चुके हैं

अन्ना और अरविन्द केजरीवाल ने बहुत से अन्य लोगों से साथ मिलकर जन्लोकपाल  बिल के लिए संघर्ष किया, इस के लिए सामान्य लोग सड़कों पर आ गए... लेकिन सरकार ने इसे सिर्फ वायदों के साथ छोड़ किया... संघर्ष के दौरान नेता कहने लगे, की आप लोग ऐसे सड़क से कानून नहीं बना सकते, इस के लिए आप को चुनाव लड़ना पड़ेगा, सरकार बनानी पड़ेगी...इस की परिणीती आप (आम आदमी पार्टी) के रूप में हुई...


सब लोग कहने लगे, ये लड़ सकते हैं, जीत नहीं सकते.... आप ने सब को भ्रष्टाचारी कहा , अन्य दल भी पीछे नहीं रहे, किसी ने इन्हें बरसाती कीड़े कहा,

आप एक आन्दोलन से पैदा हुआ दल था...आप ने दिल्ली के अन्दर चुनाव लड़ा  ..भाजपा को अपना नेता बदलना पड़ा .. डॉक्टर हर्षवर्धन सामने आये.. भाजपा को बत्तीस एवं आप को 28 सीटें मिली .. भाजपा और आप ने सरकार बनाने से मना कर दिया ,  उपराज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने का न्योता दिया...बहुमत न होने की वजह से उन्होंने सरकार बनाने से मना कर दिया...

लगने लगा की दिल्ली मैं राष्ट्रपति शासन लग जाएगा... क्योंकि भाजपा पीछे हट चुकी थी, और आप कह चुकी थी की वो किसी से समर्थन नहीं लेंगे..

काँग्रेस ने फिर से राजनीती की, बिना आप से बात किये उपराज्यपाल को समर्थन की चिट्ठी भेजी...

सभी नेता कहने लगे, की आप को सरकार बनानी चाहिए... भाजपा एवं काँग्रेस दोनों कहने लगे की आप अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रही है...
आप ने भाजपा और काँग्रेस दोनों को चिठ्ठी लिखी , और पुछा की उन दोनों दलों का उन मुद्दों पर क्या विचार है, जिन के लिए आप ने चुनाप लड़ा है...
भाजपा ने जवाब ही नहीं दिया, ये वही भाजपा थी जो कह रही थी की वो सकारात्मक मुद्दों पर समर्थन करेगी..
काँग्रेस ने मुद्दों पर समर्थन दिया...

आप ने दिल्ली में  मोहल्ला सभाएं की, लोगों से पुछा, और निर्णय लिया की सरकार बनाई जायेगी, लेकिन उन मुद्दों के साथ जिन के साथ उन्होंने चुनाव लड़ा है

आप ने सरकार बनाई, और अपने मुद्दों पर सरकार बनाई.. काँग्रेस को कोई मंत्री पद नहीं दिया गया, काँग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया..

एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है..
अगर आप सिद्धांतो के साथ आगे बदती है, जनता के लिए काम करती है, और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाती है,
तो ये भारत के लिए बहुत ही शुभ संकेत होगा..
अगर आप भी अन्य दलों के जैसे बदल जायेंगे, तो वो भी पतन की और अग्रसर हो जायेंगे..
कम से कम आज के दिन तो आप अन्य दलों से अलग दिख रही है...

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